सामाजिक दबाव (खान-पान)

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परिवर्तन में कार्यरत महिला समाख्या महिलाओं में जागरूकता फ़ैलाने से साथ घरेलु मुद्दों को भी हल करती है | क्योकि देश कि क़ानूनी व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी मुद्दे को हल होने के बहुत समय लग जाता है, और फैसला किस आधार पर होगा इस बात कि भी निश्चितता नहीं होती है | तो बहुत से परिवार अपनी समस्या लेकर महिला समाख्या के पास आते है और महिला समाख्या कि कोशिश होती है पुलिस के चक्कर में पड़े बिना जल्द से जल्दे परिवार एक किया जाए | इसी क्रम में एक परिवार आया कि उनकी बेटी को उसके पति छोड़ दिया है कारण पूछने पर पता लगा कि  उसका (पति) कहना है कि लड़की मोटी है इसलिय वह उसके साथ रहना नहीं चाहता है | इसलिय वह पत्नी को मारता-पीटता ताकि वह परेशान हो कर तलाक देने को राजी हो जाए |

मुझे याद आए अपने post-graduation कि क्लास जब मैंने medical and psychiatric social work के अंतर्गत कई सारे disorder (मानसिक बीमारी) के बारे में पढ़ा की ये मानसिक बीमारी किस-किस तरह के होते है, इनके होने के कारण क्या है, ये महिलाओं / पुरुषों या बच्चे / बूढ़े में से किसे अधिक होते है | तो मैंने जाना कई मानसिक बीमारी एसे है जो जैविक (biological) कारणों से सिर्फ महिलाओं/बच्चो /पुरुष/बुढो को होते है, परन्तु एसे कई मानसिक बीमारी जो सामान्य रूप से किसी को भी हो सकते है या इनके होने का कारण जैविक नहीं है | तो इसमें यदि में महिलाओं और पुरुष के अनुपात को देखू तो कई सारे या कहा जाए तो अधिकतर मानसिक बीमारी महिलाओं को होते है या होने की संभावनाएं होती है, कारण सामाजिक दबाव, अवसाद, हीनभावना आदि हो सकते है |

इनमे से एक है – Eating disorder (खान-पान के विकार) एक ऐसी मानसिक बीमारी है जो खाने-पीने से सम्बंधित है | जब इंसान बहुत ज्यादा मात्रा या बहुत कम मात्रा में भोजन खाना शुरू कर देता है तो इसे Eating disorder कहा जाता है | इसमें व्यक्ति अपने वजन या शारीरिक बनावट के बारे में बहुत अधिक सोचता है | उन्हें लगता है की उनका वजन अधिक हो गया है इसलिय वे अपना वजन कम करना चाहते है, और खतरनाक रूप से पतले हो जाते है | लोग उनसे बोलते भी है की वे पतले हो गए है पर वे विश्वास नहीं करते है और शीशे में अपना मोटापा देखते रहते है | यदि समय पर इसका इलाज न करवाया जाए तो जान भी जा सकती है | ये दो प्रकार के होते है-

Anorexia (एनोरेक्सिया)

  • इसमे लोग वजन को लेकर चिंतित होते है, खाने में कमी और व्यायाम अधिक करने लगते है
  • ये 15 बर्ष की आयु में 150 में से 1 लड़की और 1000 में से 1 लड़के को होने कि सम्भावना होती है |

Bulimia (बुलिमिया)

  • इसमें लोग वजन को लेकर अधिक चिंता करते है पर जरूरत से ज्यादा खाना खाते है, कैलोरीज घटाने के लिय चिंता करते है, और आपने आप को अपराधी अह्सूस करते है |
  • ये 20 से 25 की आयु में 100 में से 4 महिलाओं और पुरुषो को न के बराबर होने कि सम्भावना होती है |

रिसर्च के अनुसार ये लडकियों को लडको की तुलना में Eating disorder होने की सम्भावना 10 गुना ज्यादा होती है | जब हमें ये पढाया जाता था तो हम हँसते थे कि ये लड़कियों मोटे होने का डर होता है, ये हमेशा अपने फीगर कि चिंता करती रहती है और कई तरह कि बाते … हमेशा से लगता था कि क्यों लड़कियों को अपने फिगर कि चिंता होती है |

आखिर ऐसा क्या सामाजिक दबाव होता है …

अब यदि शुरुआत में दिय गए मुद्दे पर आप नजर डाले तो मेरी तरह आप भी साफ समझ जायगे क्यों लड़कियाँ इस तरह कि मानसिक समस्या कि शिकार अधिक रूप से होती है |

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