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लोग अक्सर सपने पुरे करने के घर से निकलते है, और बाद मे घर पहुचना ही एक सपना बन जाता है.

बहुत दिनों के बाद छुट्टी लेके घर गया, दिवाली के बाद से घर गया ही नही था. छुट्टी लेने के पहले भी बहुत बार सोचा, क्योकि छुट्टी लेने का मतलब है, पांच दिन की सैलरी का नुकसान. और उपर से आने जाने का खर्च अलग से. लेकिन फिर सोचा घर नहीं जाके भी इस पैसे का करुँगा क्या ? और वेसे भी एक दिन की छुट्टी आ ही रही थी गुडी पडवा की और फिर शनिवार – रविवार था. तो मैने दो और दिन की छुट्टी के लिए अर्जी दे ही दी, वो तो मिलने ही वाली थी क्योकि पिछले कई महीनो से कोई छुट्टी नहीं ली थी.

पुणे से उज्जैन का सफ़र कुछ 16 घंटो का है चाहे बस से जाओ या फिर ट्रेन से, कोई फर्क नहीं पड़ता. ये तो अपनी अपनी मर्जी की बात है. मंगलवार को विज्ञानं आश्रम से लगभग पांच बजे निकला, बस स्टैंड पहुँचने के थोड़ी देर बाद मेरा फ़ोन बजने लगा, कोई अनजान नंबर था, फ़ोन उठाया तो पता चला मेरी बस जो की 6:30 बजे थी वो रद्द हो चुकी थी. और उसकी जगह अब उन्होंने मुझे 9 बजे की बस मे आने के लिए कहा, लेकिन मे इतनी देर स्टैंड पर क्या करता, वो टिकेट कैंसिल करवाकर मैंने उसी समय नयी बस मे टिकट बनवा लिया और उससे सुबह 8 बजे इंदौर पहुच गया. इंदौर से मुझे एक और बस पकड़कर उज्जैन पहुचना था. करीब 11 बजे मैं घर पहुंचा. मेरी मम्मी घर के बाहर खड़ी मेरा इंतजार रही थी, मुझे देखते ही उन्होंने मुझे अपने गले से लगा लिया. ये एक अलग ही अनुभव था, इससे पहले मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. शायद इसलिए क्योकि इस फ़ेलोशिप से पहले कभी घर से इतनी दूर नहीं रहा.

पुरे चार दिन घर पे था, हर दिन कुछ न कुछ नया खाना खाया जो की हमारे यह किसी ख़ुशी के मौके पर ही बनाया जाता है. महाराष्ट्र मे वडा-पांव खा खा कर थक चूका था, इसलिए घर जाने से पहले ही बता दिया था कि मेरे लिए सिर्फ घर का खाना ही बनाना. चार दिन कैसे निकल गये पता ही नहीं चला. पुराने दोस्तों से मिलने और घर पर सोते सोते. सब खुश थे. लेकिन फिर वापस आने के लिए तयारी शुरू करने लगा, घर वालो ने बहुत कुछ खाने का सामान साथ मे बांध दिया था. जो अभी तक भी मे रोज थोडा थोडा करके एन्जॉय करता हु.

अब शायद फ़ेलोशिप ख़त्म होने पर ही जा पाउँगा. किसी ने सही कहा है घर और घरवालो की कीमत का पता उनसे दूर रहकर ही चलता है…

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