गर्मी, जीप, और बिना चाय के गपशप

आसपुर से सलूम्बर तबादला होने के कुछ महीने पहले मैं आसपुर के एक उजाला समूह की बैठक में भाग लेने गयी | वह मेरी ज़िन्दगी की सबसे ज़रूरी बैठक थी क्यूंकि उस बैठक को मुझे अकेले आगे चलाना था | घबराहट मुझ पर हावी हो रही थी जिसकी वजह से मेरे पेट में दर्द शुरू हो गया |

मैं एक तिराहे पर अकेले खडी थी जहाँ से एक बस 3 घंटे बाद निकालनी थी | मैं पागलो की तरह, पसीने में लथपथ किसी ऑटो या मोटर बाईक वाले का इंतज़ार कर रही थी | वहां खड़े हुए लोग मुझे और मेरे पहनावे को घूर घूर कर देख रहे थे, पर मेरा ध्यान पसीना पोछने में ज्यादा था, शायद इसलिए भी क्योंकि मुझे लोगों के इस बर्ताव की आदत हो चुकी थी | मेरे पास उस समय गाडी का लाइसेंस न होने की वजह से मुझे मेरे ऑफिस की गाडी भी नहीं मिलती थी | एक अलग तरह की खीज महसूस हो रही थी उस वक्त अपने अन्दर | बस फिर क्या, वहां खडी थी मैं, अकेली, धुप में मोम की तरह पिघलती हुई |

थोड़ी देर में एक तन तनती हुई हरे रंग की जीप पीछे से हॉर्न बजाती हुई आई और मेरे सामने रुक गयी | देखने में वो जितनी पुरानी लग रही थी, उस हिसाब से उसमे कोई खराबी या कोई पुर्जा अलग या छूटा नहीं दिखा | फीके रंग के अलवा उसमे कोई और ऐब नहीं था बस उसकी खर्रर… खर्रर… की आवाज़ मुझे चुभ रही थी | एक आदमी ने अन्दर से घूरते हुए देखा, मेरी इस हालत पर कारवाही करने लग गया और फिर उसने मेरी मदद करने की बात कही | कहते हैं की अनजान लोगों से ऐसे मदद या बात नहीं करनी चाहिए पर न जाने क्यों, मुझे उस आदमी को देखकर कुछ भी अटपटा या अजीब नहीं लगा और मैं तपाक से बैठ गयी उसकी बगल वाली सीट पर |

उसने उसकी खर्रर… खर्रर… को जैसे ही चालू किआ, सब कुछ बदल गया | घांस एकदम से हरी हो गयी, आगे की सड़क और भी खूबसूरत हो गई, खिड़की से बहार का नज़ारा एक अद्भूत तस्वीर बन गयी और गर्मी की चिलचिलाती धूप सामने के कांच में एक नयी चमक ले आई | उसने गाडी इतनी तेज़ चलाई की गर्म हवा भी मुझे जन्नत लगने लगी | मुझे लगा की मैं किसी ऐसी जगह आ गयी हूँ जो एक नक्षा कभी नहीं दिखा पायेगा | फिर एकदम से उन्होंने (गंगा भैया), जीप चलाते हुए मेरे काम के बारे में पूछा |

“मैडम, आप कहाँ से आई हो?”

“उस्ताद, मैं उत्तर प्रदेश से आई हूँ और यहाँ एक संस्था में काम करती हूँ |”

“कैसा काम?”

“मजदूरों को उनके हक़-अधिकारों की बातें बताना, उनको क़ानूनी मदद देना और घर की औरतों को जागरूक करना |”

“अरे वाह! कितना अच्छा काम है यह | इसके लिए कितनी पढाई करी आपने?”

“पढाई में तो मेने अभी बस ग्रेजुएशन ही किआ है |”

“हैं? सिर्फ ग्रेजुएशन? आगे की पढाई छूट गयी आपकी? यहाँ क्यों आ गयी आप?”

“नहीं-नहीं | पढना हैं ना | मैं तो बस एक साल के लिए यहाँ आई हूँ | इसके बाद वापस जाकर पढाई करुँगी | आगे पढाई करने से पहले थोडा राजस्थान देखना चाहती थी, तो आपके यहाँ आ गयी | शहर में आपके यहाँ जितनी खुली हवा नहीं मिलती न |”

“अच्छा है मैडम | मैं भी 10 वी पास हूँ, और बेटे को पढ़ा रहा हूँ | घर में मैं हूँ, बेटा और बेटी  हैं | बेटा तो बस पढाई छोड़ने की जिद्द करता रहता है शायद बूढ़े बाप को काम करता देख उसे अच्छा नहीं लगता, पर मैं भी बाप हूँ उसका, जब तक मैं पढ़ा रहा हूँ, वो पढ़ेगा | बड़ी बेटी अब कॉलेज में पढ़ रही है, और इसी को (बेटे को) परेशानी हो रही है | मुझे गाडी चलने से मना करता रहता है, पर मैडम, उसे आपके बारे में ज़रूर बताऊंगा की देख, तेरी बहन कॉलेज में है, और एक मैडम घणी सिटी से गाँव में आई है, और तुझे बस मेरी पढ़ी रहती है | 30 साल से गाडी चला रहा हूँ मैं मैडम, मेरा तो ज़िन्दगी का मकसद ही बच्चो को पढ़ा-लिखा कर कुछ बनने लायक करना है, ताकि वो मेरी तरह अपने बच्चों को पढ़ाने या उनकी ज़रोरातें पूरी करने में न लगे रहे पर अपनी ज़िन्दगी भी जियें |

“ज़रूर, ऐसे ही कहियेगा | उसे खुश होना चाहिए की उसके घर वाले उसकी पढाई पर इतना ध्यान दे रहे हैं | यहाँ तो बहुत से बच्चो ने स्कूल देखा भी नहीं है |”

“हाहा ! आप भी जान गयी हमारे देश को, अच्छा है, ऐसा ही होता है यहाँ तो | लो मैडम, ले आये हम आपको अंजना फला |”

फिर?

सफ़र खत्म |

मैंने उन्हें किराया दिया और इसी बात से खुश हो गयी और आज भी खुश होती हूँ की अच्छा हुआ उस दिन मेरे पास मेरा लाइसेंस नहीं था |

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