Pune-Ratanagiri-Pune

पुणे – रत्नागिरी – पुणे … सफ़र एक दिन का …

पिछले कुछ दिनो से लगातार एक जिले से दुसरे जिले मे घूमता ही जा रहा हु, और जिले भी पुरे महाराष्ट्र के बॉर्डर पर, एक कोने से दुसरे कोना, नागपुर, पालघर, बीड, जलगाँव, सिंधुदुर्ग और रत्नागिरी.

इस बार रत्नागिरी गया, एक दिन रुक पाया मुश्किल से वहा, क्योकि एक मीटिंग के लिए फिर से पुणे पहुचना था, रत्नागिरी मे भी दापोली तालुका मे चिखल्गाव नाम के एक गाव मे. वहा पहुचने के लिए मैं और लक्ष्मण जाधव सर रात को विज्ञानं आश्रम से निकले करीब पांच बजे के आस पास पाबल से निकले, और शिक्रापुर पहुचे, शिक्रापुर से पुणे रेलवे स्टेशन पहुचने मे कुछ दो से तीन घंटे, वो भी एस. टी. बस मे, बहुत हिम्मत वाला काम जो की महाराष्ट्र के लोगो मे कूट कूट कर भरी है, अगर बस के ड्राईवर को हेलीकाप्टर देदो उड़ने के लिए तो वो भी केर ले, एक तो हम सबसे पीछे वोली सीट पर थे, उपर से स्पीड ब्रेकर आता तो हम दो – तीन फीट उपर उछल जाते, और फिर पेट का जो हाल होता वो तो बयाँ भी नही कर सकते, इसी तरह हम पुणे स्टेशन पर पहुच गये.

लेकिन बस आने मे अभी टाइम था, तो हम एक होटल मे गये और खाना खाया, इतना उछलने के बाद भूक भी बहुत लगी रही थी, तो जाके आर्डर दिया और थोड़ी देर आराम से बैठने के बाद खाना आ ही गया, वह से खाके निकले तो पुणे रेलवे स्टेशन के पास से हमें अपने बस लेनी थी वह जाके बैठ गये, इतना तो पता था कि सारी रात कमर अकड़ने वाली है, इसलिए अभी जितना हो सके आराम कर लो, क्योकि अगले दिन बहुत कम करना था.

एक बात जरुर है महाराष्ट्र की बसे समय की बड़ी पक्की है एक मिनट भी इधर से उधर नही होता है अगर आप इधर-उधर हुए तो बस गयी समझो. करीब सुबह चार भजे हम दापोली उतरे और सवा चार बजे ही हमें अगली बस पकडनी थी तो हमने सोचा थोड़ी देर आराम से बैठा जाये, लेकिन ये थोड़ी देर कब दो घंटे मे बदल गये पता ही नी चला और सुबह के 6 बज गये, मेने जाधव सर से पूछा तो उन्होंने बताया की उन्होंने मुझे उठाने की बहूत कोशिश की लेकिंन कामयाब नही हुए, मैने सोचा अच्छा ही हुआ इतनी सुबह वेसे भी कौन उठा है, वो भी इतनी ठण्ड मे, मै तो फिर से सोने लगा तो वो बोले अब थोड़ी देर मे फिर से बस है अब मत सो जाना, मेरा तो सोने का पूरा प्लान ही चौपट हो गया. अब अगली बस पकड़कर हम चिख्ल्गाव पहुचे, अब कुछ कुछ साफ़ नज़र आने लगा था, क्योंकि करीब 8 बज चुके थे, आस-पास का नज़ारा बड़ा की सुंदर था, पहाड़ और जंगल के सिवा दूर – दूर तक कुछ नज़र ही नही आ रहा था, ठंडी – ठंडी हवा चल रही थी, तभी सामने से दो स्टूडेंट्स आते हुए दिखे वो हमें ही लेने आये थे, फिर हम उनके साथ चल दिए.

चिखल्गाव मे भी एक आई.बी.टी. स्कूल और डी.बी.आर.टी. प्रोग्राम चलता है, वही के एक लोकसाधना नाम के स्कूल मे, हम इसी स्कूल के विद्यार्थियों के हॉस्टल मे रुके, सब हमें ऐसे देख रहे थे जैसे चिद्याघर मे कोई नया प्राणी आया हो, ये भी क्यों न हो हम उनके लिए अजनबी और वो हमारे लिए, हम तो थके रहे थे, सो जैसे ही लेटे झपकी लग गयी, और इस बार तो लक्ष्मण सर भी थोड़ी देर के लिए सो ही गये. फिर थोड़ी देर बाद हमें वही का एक विद्यार्थी नाश्ते के लिए बुलाने आया तो हम नहा धोकर, नाश्ते के लिए चल दिए.

पूरे दिमाग मे रात की बस के झटके चल रहे थे, लेकिन नहाने के बाद कुछ आराम मिला, नाश्ते मे पोहे और चाय थी, किचन की बिल्डिंग कुछ अलग तरह से बनी हुई थी, डिजाईन मे नही, लेकिन बनाने के तरीके और मटेरियल के इस्तेमाल मे एक अलग तकनीक उपयोग की गयी थी, नाश्ते के बाद हमने हमारा कम शुरू किया, पहले तो पूरा साधना स्कूल विजिट किया, इसकी बिल्डिंग भी किचन की ही तरह थी, एक बात जो स्कूल मे अलग थी वो ये की अलग-अलग विषयों की कक्षाओ की एक जगह निर्धारीत थी, शिक्षक एक ही कक्षा  मे रहते थे, जबकि विद्यार्थी अलग अलग कक्षों मे जाते थे.

हमारा काम वहा उद्योजकता विकास की संभावनाओ को तलाशना और शिक्षकों व समन्वयको को उद्योजकता के लिए प्रेरित करना था, तो हमने उसके लिए वहा एक सेमिनार लिया जिसमे 15 लोग थे मेरे और लक्ष्मण सर के आलावा. सेमीनार मे हमने विज्ञानं आश्रम की तरफ से उद्योजकता विकास के लिए उपलब्ध सहयोग व मौको के बारे मे विचार-विमर्श किया और पहले सफल हो चुके उद्योजको के बारे मे जानकारी भी दी. और फिर आखिर मे उनसे कुछ सवाल जवाब किये, इसी तरह 2-3 घंटे बीत गये. तब तक दोपहर के खाने का समय भी हो गया, सेमिनार ख़त्म कर कर हम खाना खाने पहुंचे, खाने मे चने के सब्जी, चपाती, दाल-चावल थे, खाना अच्छा बना था, कितना अच्छा ये जानना है तो जाओ साधना स्कूल, सब यही बता दूंगा तो आप क्या करोगे. आब आगे बढ़ते है,

जहा हम रुके थे वह से 5 k.m. की दुरी पर ही एक बीच था लेकिन रास्ता खराब होने की वजह से हमने वहा जाने का प्लान कैंसिल कर दिया, लेकिन आस पास का इलाका देखने के लिए हम वही के एक शिक्षक के साथ उसकी मोटर-साइकिल पर निकल पड़े, थोड़ी दूर तक घूम फिर  वापस लौट आये, थोड़ी देर आराम करने के बाद वापिस जाने की तयारी करने लगे, वहा के लोगो के बोला की आज यही रुक जाओ लेकिन नही रुक सकते थे, मुझे लगा शायद लक्ष्मण सर भी रुकना चाहते है, लेकिन वो बोलेते भी तो मे कहा रुकने वाला था, तो वो भी चल पड़े, बहुत देर तक हम स्कूल के बाहेर की सड़क पर बस का इंतजार करते रहे.  करीब एक घन्टे बाद बस आई, हम बस बैठे और चल दिए वापस दापोली की ओर, हम पहले ही बहुत लेट हो चुके थे, क्योकि बस का आने जाने का समय पता नही था, दापोली पहुचने के बाद लगभग 3 घंटे तक बस का इंतजार करते रहे, लेकिन बस तो पहले ही निकल चुकी थी और अगली बस रात के 8 बजे थी, लेकिन उसके पहले हमें मानगाँव भी पहुचना था, तो वहा से हमने आखिरकार टुकडो टुकडो मे सफ़र करने का निर्णय लिया, फिर हम दापोली से निकलकर राजगुरुनगर, राजगुरुनगर से खेडा, और खेडा से मुबई हाईवे पहुचे, अभी लगभग 8:30 बज चुके थे, अब हम मानगाव के लिए बस का इंतजार करने लगे जो की पिछली बार के तरह ही बेकार रहा, बहुत देर तक जब बस नही आई तो हमने ट्रक से जाने का सोचा, फिर हर एक आने जाने वाली गाड़ी को हाथ देने लगे, बहुत सी गाड़िया निकलती ही जा रही थी कोई गाड़ी रोक ही नही रहा था, फिर भी हमने हर नही मानी, आख़िरकार एक ट्रक रुका और उसमे बैठकर हम मानगावं पहुचे, वहा एक उद्योजक से मिलने के बाद वही एक होटल मे खाना खाया और करीब रात के 12 बजे हम मानगाँव से पुणे के लिए निकले, पुणे पहुचते पहुचते सुबह के चार बज गये थे, और वह से पाबल आने मे 7 बज गये, पुरे रस्ते तो हम जोश मे रहे लेकिन जैसे ही पाबल पहुचे, सारी हवा निकल गयी, पूरा शरीर दुःख रहा था, जाधव सर तो सीधे घर जाकर सो गये, लेकिन मुझे तो अभी वापस पुणे पहुचना था मीटिंग के लिए, जिसकी खातिर हम इतनी जल्दी का सफ़र तय करके आये थे, मे मीटिंग मे पंहुचा तो सही लेकिन रात को सात बजे, जब पुरे दिन की मीटिंग ख़त्म हो गयी थी, कारण था, पिछले दिन के सफ़र का नशा, थकान, और पुणे का ट्रैफिक, जिसकी वजह से पाबल से पुणे का 2:30 घंटे का सफ़र भी 5 घंटे से ज्यादा समय मे पूरा हुआ, खेर कोई बात नही, अगली बार थोडा आराम से सफ़र करेंगे, लेकिन लक्षमण सर को फिर से चलने के लिए मनाना थोडा मुशकिल होगा …

Advertisements

One thought on “Pune-Ratanagiri-Pune

  1. Thoda samay lagta hai Hindi post padhne mein, aadat nahi hai na, par Hindi bhasha ki baat hi alag hai. The sentiments are conveyed really well :-). There is no ambiguity. Well written.

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s