लफ्जों की आज़ादी

नज़रिया तेरा, सोच तेरी;
तो क्यों बोले किसी और की ज़ुबानी|
सोच को लफ्जों का रूप दे,
इन लफ्जों को आज़ाद होने दे|
अभिव्यक्त कर उन बातों को जो बरसो से दबा रखी है;
महसूस कर उस सुकून को,
जों मिलता लफ्जों को कगाज़ पे उतार कर|
डर ना तू इस पागल दुनिया से,
सब अपनी सोच को कैद किए हुए है|
इस कान कि कच्ची जनता को ना देख;
लगने दे तेरी सोच को पर;
और दिखा दे अपनी लफ्जों की ताक़त|
तोड़ दे अपनी ख़ामोशी को;
और होने दे अपने लफ्जों को आज़ाद|

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