मेमू और मैं

man in a village

सड़क पर गाड़ियों के शोर से मालूम पड़ता है भोर हो चली है। अब रातें भी कुछ लम्बी होने लगीं है। सोचता था वह दिन टले हुए सदियाँ बीत गयीं जब मनुष्य का जीवन पृथ्वी की तरह सूरज के इर्द-गिर्द ही घूमा करता था—सूरज उगने और ढलने के बीच ज़िन्दगी और सूर्यास्त पश्चात शून्य स्थिरता। गौर करने वाली बात है कि जिस सूर्य की गुलामी की मैं बात कर रहा हूँ वह अपने आप में प्रासंगिक है। वह दिन अभी सबके लिए नहीं टले—खम्बे हैं पर तार नहीं, तार हैं पर बिजली नहीं, बिजली है पर वोल्टेज नहीं, और ‘वोल्टेज’ है पर बिजली नहीं। काश ताड़ी का यह ‘वोल्टेज’ लट्टू भी जला पाता।

आप कहीं इस गलतफहमी में मत पड़ जाइयेगा कि आधुनिक भारत के जिस हिस्से की मैं बात कर रहा हूँ वह अभी भी प्राचीन युग में अटका पड़ा है। हाँ, प्रगति में कुछ सामाजिक बंदिशें ज़रूर हैं लेकिन एक लट्टू यहाँ भी जलता है, सौर प्लेट वाला चाइनीज़ लट्टू अर्थात एल.ई.डी। रात की काली सन्नाहट में चाँद और तारों सा टिमटिमाता सफ़ेद रौशनी का यह लट्टू आपको यहाँ घर-घर में मिलेगा।

पहले हम अधीनस्थ थे सूर्य के अपनी दिनचर्या के लिए, फिर अपना सूरज तेल में ढूंढने की कोशिश करी। लेकिन तेल का यह सूरज भी एक ख़ास तबके का विशेषाधिकार बन गया। समय बदल चुका है; एक बार फिर नई पहल उठी है, एक अनूठा सूर्योदय हो रहा है जिसके सूरज का तेज वंचितों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करेगा। विद्युतप्रकाशीय प्रभाव की खोज और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के विलय ने सूरज को आने वाले समय का प्रभावशाली समतावादी बल बना दिया है। ज़रुरत है सब्र की—मौसम में होते हुए अपरिवर्तनीय बदलावों के शिरोबिंदु और तेल के भण्डार के अधोबिंदु के मिलन का।

वैसे, बगल की आरी (पगडण्डी) पर कुछ वैज्ञानिक फ्यूज़न रिएक्टर पर भी काम कर रहे हैं। अगली बार जब मेमू में बैठने की जगह नहीं मिलेगी तो सोचूँगा। पटना और गया के बीच मैं अक्सर मेमू (MEMU – Mainline Electric Multiple Unit) से सफ़र करता हूँ। वैसे तो पैसेंजर रेल भी है लेकिन मेमू दिन के समयानुसार ढाई से तीन घंटे का समय लेते हुए भी कहीं ज़्यादा समय पाबन्द है।   

पिछले हफ्ते दशहरा के दिन गया से दोपहर की मेमू पकड़ पटना आ रहा था। बिहार में पर्व बड़ी मान्यता रखते हैं; हर व्यक्ति हर्षोल्लास के साथ मनाने की कोशिश भी करता है। रेलगाड़ी खाली थी, बैठने की जगह भी मिल गयी। जहानाबाद से चढ़ीं तीन महिलायें मेरे सामने वाली सीट पर बैठीं: दो बुजुर्ग और एक अधेड़ उम्र की महिला। पर्व के दिन शायद अपने घर वापस जा रहीं थीं। अधेड़ उम्र की महिला की चटख गुलाबी साड़ी में तरह-तरह के चमकीले डिज़ाइन जड़े हुए थे, मांग में हल्का नारंगी सिन्दूर था और कलाइयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ खनक रहीं थीं। तारेगना आते-आते मुझे समझ आया बुजुर्ग महिलाओं में एक माँ थी और दूसरी सास।

तारेगना पर मेमू रुकी और बेटी की आँखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी। माँ बाहर खिड़की पर आई, उनकी आँखों में भी जुदाई के आँसू दिख रहे थे। सास ने बीस रुपये माँ के पल्लू में बाँध दिए। मेमू के सफर से मेरा लगाव और अश्रु की धाराओं के वेग को जोड़ने वाली कड़ी समान थी। जैसे ही हल्की सीटी दे मेमू आगे बढ़ने को हुई, माँ ने बिलख कर पीठ मोड़ ली और मेमू का त्वरण अश्रुधारा में विलीन हो गया।

इस सब में मैं दीवार पर बैठी मक्खी सा सब देखता रहा। मैं कल अचानक वापस मेमू में पहुँच गया जब एक सज्जन ने कहा कि तुषार जी, जुदाई बहुत ही दर्दनाक होती है, फिर चाहे वह एक दिन की हो या हमेशा की।

तुषार दलसिंघसराय और गया के बीच आते-जाते इसी तरह की उथल-पुथल से झूझते रहते हैं।

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