लिखना बहुत कुछ चाहता हूँ

कई दिन से सोच रहा हूँ कि आज-कल में ब्लॉग लिखूँगा। डेडलाइन भी कब की निकल चुकी है; बल्कि अब तो अगली ब्लॉग की डेडलाइन भी माथे पर है। लेकिन आज मैं समय की वजह से नहीं लिख रहा हूँ। जान पड़ता है कि अब पहले जैसा अन्तर्मन का तूफ़ान नहीं रहा जब कई दिन और रातें अवसाद के काले बादलों तले निकल जाती थीं। कभी-कभी तो कई दिन बीत जाते थे मुझे अपने दूसरी मंज़िल के कमरे से उतरे हुए। इन बादलों की गर्जन बड़ी भयावह होती है जो गड़गड़ाह कर अपने साथ जीवन विलय करने की क्षमता रखती है। तूफ़ान भले ही थम गया हो, बादल अभी भी ताक लगाये बैठे हैं।

चलिए कोई सुनने-सुनाने वाला नहीं है, तो आपको ही सुना रहा हूँ अपना दुखड़ा। पचड़े में पड़ गया हूँ कि नोट्स पर आधारित लेख लिखूं या ऐसे ही कुछ राग सुनाकर मानसिक शान्ति का प्रयास करता रहूँ। ऐसा नहीं कि मैं बड़ा आलसी हो गया हूँ। मैंने मोबाइल फ़ोन में कई नोट डाल रखे हैं ब्लॉग के लिए, एक कागज़ का टुकड़ा भी बटुए में पड़ा है। समय की ही शायद कुछ कमी है। आज सफर में इंटरसेक्शन पॉडकास्ट सुन रहा था जिस पर अक्षत राठी अपना पॉलीफेजिक नींद चक्र का अनुभव बता रहे थे। पढ़ा तो मैंने भी कई बार उबेरमन नींद चक्र के बारे में है लेकिन कभी आजमाने की कोशिश नहीं की। सोचता हूँ मैं भी टुकड़ों में नींद पूरी कर आइंस्टाइन बन जाऊँ। खैर! कुछ विद्वानगण अभी कोशिश करते रहने और पॉजिटिव सोच की सलाह लेकर आते ही होंगे।

समय की कमी पढ़ते ही आपके मन में भी शायद कुछ सुझाव उमड़ आये होंगे, जैसे कि, समय मिलता नहीं, निकालना पड़ता है। मुझे यह बात हमेशा थोड़ी अजीब सी लगती रही है। समय के बारे में मेरा यह कहना सिर्फ लेखन सम्भंधि ही है। लेखन हर मायने में बड़ी ही गंभीर कला है: पहले कुछ अनुभव, फिर कुछ सोच-विचार, फिर लेख की एक रूप-रेखा, और अन्त में तराशा हुआ शद्बों का आइना। देखने में काफी सरल प्रतीत होता है, लेकिन है बिलकुल जलेबी सरीखा टेढ़ा मामला। निश्चित तौर पर मानव की सीमाओं में समय अब तक सीमित ही है। ऐसे में क्या समय निकाल पाना ही लेखन के लिए पर्याप्त है?  

आज मन में एक ख़याल आया जब विद्युत उपकेन्द्र के बाहर से बारिश में बस निकली। भावनाओं का हुजूम और मष्तिष्क की विद्युत तरंगों में खासा फरक नहीं है। तारों के जंजाल में दौड़ता विद्युत वेग अन्तर्मन का द्वंद्व ही है। बारिश इस वेग को कुछ प्रभावित करती तो है परन्तु द्वंद्व शून्य पर आकर ही थमता है। इसके बारे में सोचने और कभी-कभार ज़ाहिर करने से विचारों में कुछ लय ज़रूर आ जाती है। लेखक और पाठक का रिश्ता इस लय पर ही निर्भर करता है। ऐसे में, कल्पना होते हुए भी क्या लेखक के आइने में उसकी झूठी परछाईं हो सकती है?

हवाई अड्डा भी नींद से अछूता नहीं है

सुबह के पाँच बज रहे हैं। हवाई अड्डे पर बैठ कर लिख रहा हूँ। कोशिश करी थी कुछ देर सोने की लेकिन हर बार की तरह इस बार भी कुछ ख़ास सफलता हाथ नहीं लगी। कमर और धड़ तो बहुत आराम में था लेकिन गर्दन के दर्द ने सोने नहीं दिया। यदि शरीर के सभी अंगों से राय लेकर एक पार्टिसिपेटरी नींद लेने की कोशिश करता तो अच्छा रहता। कुछ देर सोया तो उसमें भी एयर इंडिया का फ़ोन आ गया कि जहाज साढ़े-तीन घंटा देरी से उड़ेगा जिसका कि उन्हें खेद है। खेद तो है, मगर क्या वह जानते हैं मेरी गर्दन की व्यथा के बारे में?  

तुषार अपने सवालों के जवाब आपमें ढूंढने की सफल कोशिश करना चाहते हैं। साथ में, बिहार में ‘ई-मेल निंजा’ बनने की कला भी सीख रहे हैं।  

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